Kumbh 2025,(आज समाज), नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में 45 दिन तक चले दुनिया के सबसे बड़े समागम महाकुंभ में जुटे 140 करोड़ देशवासियों की जबरदस्त एकता पर अपनी हैरानी जताई है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में उन्होंने महाकुंभ को ‘एकता का महायज्ञ’ बताया। पीएम ने कहा, महाकुंभ का समापन हो गया, एकता का महायज्ञ पूरा हो गया है।

साथ आई 140 करोड़ देशवासियों की आस्था

पीएम मोदी ने कहा, प्रयागराज में एकता के महाकुंभ में 45 दिन तक जिस तरह से 140 करोड़ देशवासियों की आस्था एक साथ आई, वह अभिभूत करने वाला है। उन्होंने बताया कि महाकुंभ के समापन के बाद मेरे मन में कुछ विचार आए और उन्हें मैंने कलमबद्ध करने का प्रयास किया है। मोदी ने ‘एकता का महाकुंभ, युग परिवर्तन की ध्वनि’ शीर्षक से अपना एक ब्लॉग लिखा और इसका लिंक साझा किया। इसमें उन्होंने अपने विचारों को विस्तार से बताया है।

महाकुंभ समाप्त हो गया,  एकता का महायज्ञ समाप्त हो गया

ब्लॉग में पीएम मोदी ने इस आयोजन को राष्ट्र की चेतना के प्रतीकात्मक जागरण के रूप में वर्णित किया, जो सदियों की गुलामी के अंत और एक नए युग के उदय का प्रतीक है। उन्होंने लिखा, महाकुंभ समाप्त हो गया… एकता का महायज्ञ समाप्त हो गया। जब किसी राष्ट्र की चेतना जागृत होती है, जब वह सैकड़ों वर्षों की गुलामी की मानसिकता की सभी बेड़ियों को तोड़ देती है और नई चेतना के साथ हवा में सांस लेना शुरू करती है, तो ऐसा ही दृश्य दिखाई देता है, जैसा हमने 13 जनवरी से प्रयागराज में एकता के महाकुंभ में देखा।

महाकुंभ के दौरान सभी देवी-देवता एकत्र हुए

पीएम ने लिखा, 22 जनवरी, 2024 को अयोध्या में राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह के दौरान, मैंने ईश्वर की भक्ति के माध्यम से देशभक्ति के बारे में बात की थी। प्रयागराज में महाकुंभ के दौरान सभी देवी-देवता एकत्र हुए, संत-महात्मा एकत्र हुए, बच्चे-बूढ़े एकत्र हुए, महिलाएं-युवा एकत्र हुए और हमने देश की जागृत चेतना देखी। यह महाकुंभ एकता का महाकुंभ था, जहां 140 करोड़ देशवासियों की आस्था एक ही समय में इस एक उत्सव के माध्यम से एकत्रित हुई, ऐसा ब्लॉग में लिखा है।

एकता और सद्भावना की प्रेरणा देता है उत्सव

पीएम ने लिखा, पवित्र नगरी प्रयागराज के इस क्षेत्र में एकता, सद्भावना और प्रेम का पवित्र क्षेत्र श्रृंगवेरपुर भी है, जहां भगवान श्री राम और निषादराज का मिलन हुआ था। उनके मिलन की वह घटना भी हमारे इतिहास में भक्ति और सद्भावना के संगम की तरह है। प्रयागराज का यह तीर्थ आज भी हमें एकता और सद्भावना की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा, पिछले 45 दिनों से मैं हर रोज देख रहा हूं कि कैसे देश के कोने-कोने से लाखों लोग संगम तट की ओर बढ़ रहे हैं। संगम पर स्नान करने की भावना की लहर बढ़ती जा रही है। हर श्रद्धालु बस एक ही चीज के मूड में है- संगम पर स्नान करना। मां गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम हर श्रद्धालु को उत्साह, ऊर्जा और आस्था से भर रहा है।

पूरे विश्व में इतने बड़े आयोजन की कोई तुलना नहीं

प्रधानमंत्री ने लिखा, प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ आधुनिक युग के प्रबंधन पेशेवरों, नियोजन और नीति विशेषज्ञों के लिए नए अध्ययन का विषय बन गया है। आज पूरे विश्व में इतने बड़े आयोजन की कोई तुलना नहीं है, ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं है। पूरी दुनिया आश्चर्यचकित है कि कैसे इतनी बड़ी संख्या में करोड़ों लोग एक नदी के किनारे, त्रिवेणी संगम पर एकत्रित हुए। इन करोड़ों लोगों को न तो कोई औपचारिक निमंत्रण मिला था और न ही आने के समय के बारे में कोई पूर्व सूचना। लोग बस महाकुंभ के लिए निकल पड़े और पवित्र संगम में डुबकी लगाकर धन्य हो गए।

बड़ी संख्या में देश की युवा पीढ़ी का प्रयागराज पहुंचना सुखद

मोदी ने लिखा, मैं वो तस्वीरें नहीं भूल सकता। मैं स्नान के बाद अपार खुशी और संतुष्टि से भरे उन चेहरों को नहीं भूल सकता। चाहे वो महिलाएं हों, बुजुर्ग हों या हमारे दिव्यांग हों, हर किसी ने संगम तक पहुंचने के लिए जो कुछ हो सकता था, किया। उन्होंने कहा, मेरे लिए यह देखना बहुत सुखद रहा कि भारत की आज की युवा पीढ़ी इतनी बड़ी संख्या में प्रयागराज पहुंची। यह एक बहुत बड़ा संदेश है। इससे यह विश्वास मजबूत होता है कि भारत की युवा पीढ़ी हमारे मूल्यों और संस्कृति की वाहक है और इसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी समझती है और इसके लिए दृढ़ संकल्पित और समर्पित भी है।

अविस्मरणीय, पिछले कुछ दशकों में ऐसा कभी नहीं हुआ

महाकुंभ के लिए प्रयागराज पहुंचने वाले लोगों की संख्या ने निश्चित रूप से एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। लेकिन इस महाकुंभ में हमने यह भी देखा कि जो लोग प्रयागराज नहीं पहुंच पाए, वे भी भावनात्मक रूप से इस आयोजन से जुड़ गए। जो लोग कुंभ से लौटते समय त्रिवेणी तीर्थ का जल अपने साथ ले गए, उस जल की कुछ बूंदों ने भी लाखों श्रद्धालुओं को कुंभ स्नान के समान पुण्य दिया। कुंभ से लौटने के बाद जिस तरह से हर गांव में इतने लोगों का स्वागत किया गया, जिस तरह से पूरे समाज ने उनके प्रति सम्मान के साथ अपना सिर झुकाया, वह अविस्मरणीय है। यह कुछ ऐसा है जो पिछले कुछ दशकों में पहले कभी नहीं हुआ।

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