(Jind News) जींद। चैत्र माह की अमावस्या शनिवार को बेहद खास संयोग लेकर आ रही हे। इस दिन दिन शनिवार है। जिसके चलते इस अमावस्या को शनि अमावस्या भी कह कर पुकारा जा रहा है। साथ ही सूर्य ग्रहण का संयोग भी रहने वाला है। हालांकि यह ग्रहण भारत में दिखाई नही देगा। जिससे इसका सूतक काल लागू नही होगा। बावजूद इसके यह दिन पितृ तर्पण के लिए विशेष है।

क्योंकि शनि अमावस्या को पितरों की कृपा पाने के लिए महत्वपूर्ण मानी जाता है। इस दिन पितरों का श्राद्ध और तर्पण करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है और पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। वहीं शनिदेव की विशेष कृपा प्राप्त होगी। जयंती देवी मंदिर के पुजारी नवीन शास्त्री ने बताया कि पौराणिक कथाओं के अनुसार जब महाभारत के दौरान कर्ण की मृत्यु हो गई और उसकी आत्मा को स्वर्ग भेज दिया गया तो उसे नियमित भोजन नही दिया गया और इसके बजाय उसे सोना और जवाहरात दिए गए।

उसने इंद्र से पूछा कि उसे सामान्य भोजन क्यों नही मिल रहा है। इस पर भगवान इंद्र ने कहा कि उसने अपने पूरे जीवनकाल में दूसरों को सभी प्रसाद चढ़ाए लेकिन अपने पूर्वजों के लिए कभी कुछ नही किया। कर्ण द्वारा अनुरोध किए जाने पर और यह पता लगाने के बाद कि वह उनके बारे में नही जानता था,  भगवान इंद्र ने कर्ण को 16 दिनों के लिए पृथ्वी पर लौटने का फैसला किया ताकि वह अपने पूर्वजों को भोजन प्रदान कर सके।

16 दिवसीय अवधि को पितृ पक्ष के रूप में मनाया जाता

इस 16 दिवसीय अवधि को पितृ पक्ष के रूप में मनाया जाता है। पांडू पिंडारा स्थित पिंडतारक तीर्थ पर शनिवार को चैत्र अमावस्या पर श्रद्धालु सरोवर में स्नान, पिंडदान करके करके तर्पण करेंगे। इस दौरान मेले का भी आयोजन किया जाएगा। प्रशासन ने पिंडारा तीर्थ पर श्रद्धालुओं को किसी तरह की परेशानी न हो, इसकी व्यवस्था कर दी है। पुलिसकर्मियों की तैनाती के साथ-साथ सुरक्षा के प्रबंध किए गए हैं।

पांडवों ने यहां 12 वर्ष तक सोमवती अमावस्या की प्रतीक्षा में तपस्या की

पिंडतारक तीर्थ के संबंध में किदवंती है कि महाभारत युद्ध के बाद पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पांडवों ने यहां 12 वर्ष तक सोमवती अमावस्या की प्रतीक्षा में तपस्या की। बाद में सोमवती अमावस के आने पर युद्ध में मारे गए परिजनों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान किया।

तभी से यह माना जाता है कि पांडु पिंडारा स्थित पिंडतारक तीर्थ पर पिंडदान करने से पूर्वजों को मोक्ष मिल जाता है। महाभारत काल से ही पितृ विसर्जन की अमावस्या, विशेषकर सोमवती अमावस्या पर यहां पिंडदान करने का विशेष महत्व है।

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