Chandigarh News: स्त्री की संवेदना के प्रखर पहलू को उजागर करता पंजाबी नाटक ,”इक सी मैं ,”का रहा सफल मंचन

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Chandigarh News: चंडीगढ़ में टैगोर थिएटर के मिनी सभागार में एक सशक्त कहानीकार वीणा वर्मा के कथानक पर आधारित पंजाबी नाटक” इक सी मैं ” का मंचन रूपक कला एवं वेलफेयर सोसाइटी के तत्वाधान स्त्री की संवेदना के प्रखर पहलू को उजागर करती एक सफल प्रस्तुति कहलाएगी।।संगीता गुप्ता एक रंगकर्मी ही नहीं मार्मिक संवेदनाओं पर अपनी विवेचना लिए जागरूक विषयों की जोरदार समर्थक भी हैं।स्त्री की संवेदनाओं के भावनात्मक पहलू को उजागर करते कथानक का रूपांतरण और  ज्वलंत सवालों से  सजा नाटक निश्चय ही  प्रस्तुति से  सामाजिक विसंगति पर प्रहार करता विशेष औचित्य लिए था। संगीता एक अनुभवी एवं सुलझी हुई निर्देशिका हैं जो अपनी विशिष्ट शैली और रंगमंच पर अपनी मजबूत पकड़ रखती हैं।चंडीगढ़ में रंगमंच को जिंदा रखने में रूपक कला एवं वेलफेयर सोसाइटी अपनी सक्रिय भूमिका से परिभाषित होता है। इसका श्रेय जज्बे और लग्न से ओतप्रोत युवा रंगकर्मियों के जोश और अभ्यास के मर्म को भी जाता है। लेकिन वर्चस्व पर पहुंचने के लिए और उत्कृष्ट मयार हेतु आपको सभी मानक मापदंड पर पूरा उतरना होता है।समीक्षक का धर्म है वह प्रस्तुति को उत्तम मानक पर परिभाषित करने हेतु  मंचन में कोई भी खटकती चूक हो तो उस पर  पर्दा न ढाल उसे नजरअंदाज न करे और इस लिहाज़ से कुछ विसंगतियों पर निर्देशक का दायित्व ज़रूरी है। रूपांतरण और कथानक अपनी गरिमा ,मर्यादा और तहज़ीब का आचरण संभाल कर रखें तथा अपने हुनर से कोई समझौता न करे तो अच्छा है ।
भगवान राम के बारे में संवाद में सीता के चरित्र संशय पर लेखिका अथवा निर्देशक की अपनी सोच  हो सकती हैं लेकिन इसे इतने प्रखर विश्लेषण से परिभाषित करना निश्चित ही अवांछनीय भी है और अस्वीकार्य भी।निर्देशक को इससे बचना चाहिए।इसे संवाद रचना से सुधरा जा सकता था।  युवा रंगकर्मियों के अभिनय कौशल में कोई कमी नहीं थी अभ्यास भी उत्तम था लेकिन दृश्य रचना में कही कहीं नाटकीय पक्ष उभरता निर्देशक का ध्यान मांगता है।किरदार और दृश्य रचना अगर  स्वाभाविक रहे तो सफलता को परिभाषित करता है। सोशल सिक्योरिटी बने अंग्रेज अधिकारी के पंजाबी संवाद वहीं उसके दूसरे चरण में अंग्रेजी में ही थे जो दुरुस्त नहीं लगता। दृश्य रचना कहीं सुंदर मार्मिक रही तो कहीं अपने मानक से बहुत नीची भी।नौकर के किरदार में हरमन अच्छा अभिनेता है जिसे निर्देशक सशक्त दृश्य रचना से नाटक के सफल पक्षकार बना सकता था। दैहिक संबंध के दृश्य भी थोड़ा सम्भल कर और शालीन बन सकते थे हालांकि निर्देशिका चद्दर का प्रयोग लिए इस पहलू पर सचेत नजर आई लेकिन उनके हुनर  काबिलियत  समझ से वाकिफ समीक्षक इसे और अधिक गरिमा  संजोए अपेक्षा लिए है। नायिका अनीता के किरदार में संजना जोशी का अपने किरदार में डूब कर नाटक के बाद भी भावनात्मक प्रभाव से जुड़े रहना निर्देशक और रंगकर्मी के श्रद्धेय नाट्य प्रेम को प्रमाणित करता प्रशंसनीय है।कुल मिलाकर  नाटक का चयन और मंचन  नाट्य, रूह और मकसद से स्त्री के मार्मिक तल्ख और सामाजिक अनुभव से उपजती पीड़ा के औचित्य और समाधान की तलाश लिए बड़ा सार्थक रहा जिसे सक्षम और अनुभवी निर्देशिका ने खूबसूरती से प्रस्तुत किया।ऐसे नाटक अच्छे दर्शकों तक पहुंचे इस पर प्रशासन का सहयोग वांछनीय है ।मिनी थिएटर की जगह टैगोर के बड़े सभागार निशुल्क उपलब्द कराने पर प्रशासन को सोचना चाहिए।निर्देशिका द्वारा अनुदान की गुहार जबकि नाटक का प्रदर्शन निशुल्क हो कला का अपमान है। प्रशासन से पूर्ण सहयोग की अपील और नाटक प्रस्तुति के सफल मंचन पर संयोजकों को बधाई।