श्री सेठ ने कहा कि लंबे समय से महिलाएँ अपने घरों में सीएफओ की भूमिका निभाने के साथ-साथ परिवार में रोजमर्रा की आर्थिक गतिविधियों को संभालती रही हैं। फिर भी ज़्यादातर महिलाएँ लंबे समय की फाइनेंशियल प्लानिंग का काम अपने पिता या पतियों पर छोड़ देती हैं, चाहे वे कितनी भी पढ़ी-लिखी हों या कहीं भी रहती हों। हालांकि पहले की तुलना में इन दिनों उनकी भागीदारी थोड़ी बेहतर हुई है, लेकिन हमें ज्यादा-से-ज्यादा महिलाओं को आगे बढ़कर अपने वित्तीय भविष्य की जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार करने की जरूरत है, जिसकी शुरुआत शिक्षा से होती है।
श्री सेठ ने कहा कि सामान्य तौर पर महिलाएँ आगे बढ़कर अर्थव्यवस्था में योगदान देती हैं, और उनके अरमान भी उनकी भागीदारी के साथ-साथ विकसित हुई हैं। आज, महिलाएँ बड़ी संख्या में बोर्डरूम और लीडरशिप की भूमिकाएँ संभाल रही हैं, और इस गति को बढ़ाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। लगभग 18 प्रतिशत भारतीय स्टार्टअप की कमान अब महिलाओं के हाथों में हैं, साथ ही उनके लिए लोन की उपलब्धता भी लगातार बेहतर हुई है। सरकार की पहलों ने भी इस इकोसिस्टम को मजबूत बनाने में बेहद अहम भूमिका निभाई है। महिलाओं के लक्ष्यों और उनके प्रतिनिधित्व में बढ़ोतरी के साथ-साथ हम उनके अरमानों में और भी गहरा बदलाव देखेंगे, और इस तरह फाइनेंशियल लिटरेसी उनके आर्थिक भविष्य को सुरक्षित बनाने वाला बेहद महत्वपूर्ण साधन बन जाएगी करेगा।
इस स्टडी में सही मायने में इस बात को उजागर किया गया है कि, फाइनेंशियल लिटरेसी की कमी किस तरह अपनी जमा पूंजी बनाने के उनके सफ़र पर असर डाल रही है। कम-से-कम 38 प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि उन्होंने अपने म्यूचुअल फंड को समय से पहले ख़त्म कर दिया, 32 प्रतिशत महिलाएँ समय से पहले ही शेयरों/इक्विटी से बाहर निकल गईं, और 31 प्रतिशत महिलाओं ने अपनी लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी सरेंडर कर दीं।
सीधे तौर पर सामने आने वाली इन आर्थिक चुनौतियों का मन पर काफी बुरा असर होता है। इस जेनरेशन की 61 प्रतिशत महिलाएँ फाइनेंशियल सेफ्टी नेट होने के बावजूद लगातार पैसे खत्म होने को लेकर चिंतित रहती हैं, और 64 प्रतिशत महिलाओं को लगता है कि उनकी बचत और इन्वेस्टमेंट भविष्य के लिए काफी नहीं हैं।