Chandigarh News: जिंदगी एक सफर है जो लगातार चल रहा है अगर हम पल का आनंद लेकर चले तो यह जिदगी बेहद खूबसूरत है। आज जीवन की भागदौड भरी जिंदगी मे सब कुछ चलायेमान हो रहा है, जिसको देखा सिर्फ वह भाग रहा है अगर पूछा जाये कि मंजिल कहां है तो पता नही, दिशा का ज्ञान नही, लेकिन भागे जा रहा है।
यह कैसी भागदौड है। ऐसी भागदौड से बचे और अपने आपको हर परिस्थति मे एक सी मनोस्थिति वाली प्रवृत्ति बनाये तभी जीवन मे आनंद आयेगा। ये शब्द मनीषीसंतमुनिश्रीविनयकुमार जी आलोक ने अणुव्रत भवन सैक्टर 24सी तुलसीसभागार मे अपने व्यक्त्व मे कहे।
मनीषीसंत ने आगे कहा अक्सर देखने को मिलता है कि हर कोई नकारात्मकता से भरा हुआ है कोई बात कहिये वह नकारात्मकता की तरफ ही बढता जाएगा, इसलिए अपने आपको स्थिर रखने की कोशिश करे और हो सके तो प्रसन्न ही रहिये। कीचड़ के छींटे आपके ऊपर आते ही जाएंगे। पर आप अगर चीजों के प्रति बेपरवाह अपनी स्थिति में लीन रहेंगे तो कीचड़ नीचे बैठ जाएगा। ऐसे समय जबकि आपको लग रहा है कि आसपास बहुत नकारात्मकता है तो शांति बनाए रखो।
जब आप दूसरों की कटुता को लेकर बहुत परेशान होना बंद कर देते हैं तो अपने भीतर अमृत का स्रोत तलाश लेते हैं। यही शांति की अवस्था है। जब आप इस बात को समझ लेंगे तो आपकी तकलीफें और दुख खत्म हो जाएगा। सुख एक मानसिक स्थिति है और यह एक अनुभूति है जो स्वयं अंदर से महसूस होती है।
इसे बाहर ढूंढने से यह कभी नहीं प्राप्त हो पाएगा।यह व्यक्ति और व्यक्ति के स्वभाव पर भी निर्भर करता है कि उसे सुख किसमें कितना मिलेगा। इसकी सही व्याख्या कोई नहीं कर सकता। केवल व्यक्ति ही समझ सकता है कि उसके सुख का पैमाना क्या है।
मनीषीसंत ने अंत मे फरमाया किसी को भक्ति में सुख मिल रहा है तो किसी व्यक्ति को अपने बल प्रदर्शन में सुख की अनुभूति हो रही है। किसी को प्रथम आने पर सुख की अनुभूति होती है तो किसी को खेल में।तो इस तरह यह बात सिद्ध हो जाती है कि हमारे सुख का पैमाना हम खुद ही बना सकते हैं।
कोई दूसरा व्यक्ति उसका निर्धारण नहीं कर सकता पर ज्यादातर लोग कोई अच्छा काम करके किसी तरह का सुकून महसूस करते हैं वह एक अलग ही अनुभूति होती है। इसी तरह कड़े श्रम के बाद किसी तरह की प्राप्ति भी अपने आप में अवर्णनीय सुख है। माता पिता के लिए उसकी संतान का प्रगति करना असीम सुख की अनुभूति कराता है।
यदि लोग आपकी उदारता को नही पहचान पातें हैं तो तीसरी तकनीक भेद काम में आती है। इसका अर्थ है तुलना करना, दूरी उत्पन्न करना। यदि कोई व्यक्ति आपसे उलझता है तो पहले आप उस से बात करे।
यदि इस से बात नहीं बने तो प्रेम से उनकी उपेक्षा कर दें। उन्हें स्वयं ही समझने का अवसर दें। आपकी उदारता और उपेक्षा उनको उनकी गलती का अनुभव करवा देगी। लेकिन यदि वे उस पर ध्यान नहीं दे तो उनसे भेद कर लें और उनसे दूरी बना लें।