संपादकीय
धर्म आधारित नहीं होगी राजनीति.... अब जनप्रतिनिधित्व कानून में बदलाव की बारी
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 अनिल कुमार

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने एक अहम फैसला सुनाया... यह फैसला आम आदमी के लिए ऐतिहासिक और गौरान्वित करने वाला था... लेकिन किसी एक विशेष वर्ग के लिए तो यह फैसला किसी अभिशाप से कम नहीं है.... राजनीति में अब वोट मांगने के लिए कोई भी दल धर्म, जाति, समुदाय या भाषा आदि का इस्तेमाल नहीं करेगा- सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ राजनीतिक दलों से कहते हुए यह फैसला सुना दिया। यकिनन इस फैसले से आम वोटर राहत की सांस ले रहा होगा क्योंकि चुनाव आते हीं हर राजनीतिक दल उसे धर्म और जाति के आधार पर बांटने के लिए तमाम तरह के हथकंडे अपनाते थे और फिर समाज में व्यवधान उत्तपन्न हो जाता था... सामाजिक रिश्तों में दरार पड़ जाती थी... भाई-भाई से अलग हो जाता था... परिवार टूटकर बिखर जाता था.... समाज में अराजक तत्वों का बोलबाला ज्यादा हो जाता था। 
सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि इस फैसले से चुनावों के दौरान धर्म-समुदाय के आधार पर लोगों को बांटने और समाज में द्वेष फैलाने वालों पर लगाम लगेगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव एक धर्मनिरपेक्ष पद्धति है इसलिए चुनावों के दौरान धर्म के आधार पर वोट मांगने या वोट करने की अपील करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी और इस व्यवहार को चुनावी कानूनों के तहत भ्रष्ट आचरण के बराबर माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब कोई भी राजनीतिक दल धर्म या समुदाय, भाषा विशेष पर वोट नहीं मांग सकता और नहीं वोट करने की अपील कर सकता है... इसी कारण सभी राजनीतिक दल इस पशोपेशल में आ गये हैं कि अब क्या किया जाए... इसका तोड़ कैसे और कहां से निकाला जाए...
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे देश में धर्म और जाति पर आधारित राजनीति आज हो रही है ऐसा नहीं है.. यह सालों-साल से चली आ रही है परन्तु राजनीति का स्तर इस मौजूदा समय में जितना नीचे आ गया है शायद इससे पहले कभी नहीं रहा है... इसलिए सुप्रीम कोर्ट को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा... एक आम वोटर के अधिकारों की रक्षा हेतू आगे आना पड़ा और फिर संवैधानिक पीठ ने 4-3 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए यह साफ कर दिया कि यदि कोई भी उम्मीद्वार ऐसा करता है अर्थात धर्म, जाति, समुदाय या फिर भाषा के आधार पर वोट मांगता है या लोगों से वोट करने की अपील करता है तो ये जनप्रतिनिधित्व कानून 123(3) के तहत भ्रष्ट आचरण माना जाएगा और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई भी की जाएगी।
आपको यह बात जरूर स्पष्ट कर दूं कि हमारे देश में धर्म, जाति, भाषा या समुदाय के आधार पर वोट मांगने की प्रथा की पहले से हीं मनाही है। लेकिन इस बार सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने धर्म की स्पष्ट व्याख्या करते हुए यह साफ कर दिया कि भगवान और इंसान के बीच का रिश्ता उनका अपना व्यक्तिगत विषय है इसलिए राजनीति में कोई भी इसका विशेष व्यवहार या इस्तेमाल नहीं कर सकता। जनप्रतिनिधित्व कानून में पहले से हीं धर्म का उल्लेख है लेकिन इसबार संवैधानिक पीठ ने धर्म का दायरा बताते हुए स्पष्ट कर दिया है कि अब किसी भी सूरत में धर्म, जाति या समुदाय का इस्तेमाल राजनीति में वोट मांगने के लिए नहीं किया जा सकता है।
सबसे हैरानी की बात यह है कि हर बार राजनीतिक दल अपने फायदे के लिए जनप्रतिनिधित्व कानून के प्रावधानों का गलत फायदा उठाकर धर्म, जाति या समुदाय का प्रचार में इस्तेमाल करने के बावजूद बचने का रास्ता निकाल हीं लेते है। और हमसबने आजाद हिन्दूस्तान के राजनीतिक इतिहास में कई बार देखा-सुना और पढ़ा भी है। धर्म आधारित राजनीति से हमारे देश के कई इलाके आज काफी पीछड़ चुके हैं, सैंकड़ों दंगे हो चुके है, समाज में द्वेष फैल चुका है। हालांकि अब बदलते माहौल और जागरूक हो रहे समाज में इस तरह के फैसले का स्वागत होना चाहिए और उम्मीद की जानी चाहिए कि राजनीति में आ चुकी इस तरह की विकृतियों को सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद दूर करने में मदद मिलेगी... राजनीतिक दल स्वंय हित के बजाय समाजहित और समाज के सर्वांगिन विकास की बात करेंगे.. किसी एक जाति, धर्म या समुदाय को आगे न रखकर विकास के पैमाने पर चुनाव लड़ेगें और अपने प्रशंकों व आम वोटरों से विकास तथा जनहित के पैमाने पर वोट करने की अपील करेंगे। वैसे तो आज तकनीक के इस दौर में हर चुनावी सभा या छोटी से छोटी आम सभा का वीडियो रिकॉर्डिंग हो जाती है जिससे कोई भी राजनीतिक दल या उम्मीद्वार अपने किसी गलती से मुकर नहीं सकते हैं और सत्य को छुपा पाना मुश्किल हीं नहीं नामुमकिन है। 
सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले के बाद यकीकन आने वाले चुनावों में इसका परिणाम देखने को मिलेगा... हर उम्मीद्वार और राजनीतिक दल सोच-समझकर चुनाव प्रचार करते नजर आएंगे लेकिन यहां पर भी एक बड़ी समस्या है कि यदि किसी उम्मीद्वार या दल ने इस फैसले का उल्लंघन कर भी दिया तो पुलिस मुकदमा दर्ज कर सकती है परन्तु उसकी उम्मीद्वारी को खत्म नहीं कर सकती। उसकी उम्मीद्वारी निर्वाचन चुनाव याचिका के माध्यम से हीं हो सकता है और चुनाव याचिका हाईकोर्ट में दायर की जाती है... अर्थात इनसब बातों के मद्देनजर यही कहा जा सकता है कि यदि किसी उम्मीद्वार ने जानबूझकर भी सुप्रीमकोर्ट के फैसले के बाहर जाकर चुनाव प्रचार करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होने में भी सालों साल का समय लग जाएगा और तबतक वह राजनीति अर्थात सत्ता-सुख को भोगता रहेगा। 
हां सुप्रीमकोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले का असर इतन जरूर होगा कि अब कोई भी दल या उम्मीद्वार खुलम-खुला हिन्दू, मुस्लिम, सिख, या अन्य धर्म समुदाय विशेष के नाम पर वोट नहीं मांगगे। जहां तक हिन्दू धर्म का सवाल है तो सुप्रीम कोर्ट ने यह पहले हीं साफ कर दिया है कि हिन्दुत्व एक जीवन शैली है अर्थात (वे ऑफ लाइफ)... इसलिए राजनीति में हिन्दू शब्द या भाषा या वर्ग विशेष का प्रयोग तो राजनीतिक दल धड्डले से कर सकते हैं परन्तु बाकी धर्मों या समुदायों के नाम का प्रयोग करना आसान नहीं होगा... हालांकि सुप्रीमकोर्ट ने यह ऐतिहासिक कदम तो उठाया है और यह सफल एवं कारगर तभी हो सकता है जब जनप्रतिनिधित्व कानून में बदलाव किया जाए.... और यह देखना जरूरी होगा कि कब वह समय आएगा जब जनप्रतिनिधित्व कानून में सुधार किया जाता है...
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