लाइफस्टाइल
प्रधानमंत्री जी को खुला खत
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 आदरणीय प्रधानमंत्री,

आठ नवंबर का आपका भाषण सुना एक पल को सुन कर लगा  कि ये तो मास्टर स्टोक मार दिया आपने... अब तो सारा काला धन एक झटके में बाहर आ जायेगा... सारा न सही कुछ तो आयेगा ही... मै खुद यह मानता हूं और चाहता भी था कि एक बार विमुद्रीकरण हो... सरकार द्वारा बडे नोट बंद किये जाये, आखिरकार आठ नवंबर के भाषण में 500 और 1000 के नोट बंद के फैसले से मैं काफी खुश हुआ... लेकिन 500 और 2000 के नये नोट सुनकर लगा यह क्या... कुछ सोचने पर कई तरह के सवाल मन में उठने लगे... जैसे जैसे दिन बढ़ते गये सवाल और बैचेनी बढ़ती ही गयी...

नोट बंदी के फैसले के बाद अगले दिन बाजार मे तो नोटो का आकाल आ गया... दो दिन एटीएम और एक दिन का बैंक बंद की बात तो आपने ही कहीं थी... खैर मैने आपकी बात भी मानी कुछ एक 100 के नोट थे तो दिन भर का काम चल गया.. बाहर हर कोई हताश परेशान था.. खाने के लिए कैटिन वाला, चाट वाला कोई भी 500 के नोट नहीं ले रहा था... बल्कि दरियादिली दिखाते हुए बाद में देने की बात कहते हुए दिखे... खैर लग रहा था जब बैंक एटीएम खुलेंगे तो ठीक हो जायेगा... नोट मिल जायेंगे सब पहले जैसा हो जायेगा...

आपके फैसले से एक फायदा यह हुआ कि घर में पूरा परिवार बैठकर बात करने लगा... घर आ कर सबसे बात हुई, दिन भर के परेशानी की बात सुनी और  सुनाई... सबसे बडी दिक्कत यह थी कि 7 नवंबर को ही पापा बैंक से 20000 रुपये निकाल कर लाये उसमें भी सारे 1000 के नोट... बहन ने गुल्लक तोडकर उस में से कुछ 100 के नोट निकाले, लगा चलो काफी है 5-6 दिन का खर्चा तो निकल ही जायेगा...

लेकिन असली नजारा तो अभी तक मै देख ही नहीं पा रहा था.. एक महाशय 2000 का नोट ले कर आये बड़े खुश थे... अगले दिन जब मिले तो उतने ही परेशान.. परेशानी का कारण पुछने पर बताया यार 4 घंटे लगा के 2000 का नोट लिया लेकिन यह तो कोई ले ही नहीं रहा..  कारण पूछने पर लगा खुल्ले न होने की सफाई सब दे रहे है... शुक्रवार को छुट्टी के दिन मैं खुद बैक गया कतार इतनी लंबी की हिम्मत ही नही हुई... आखिरकार मैं एटीएम की लाईन में लग गया... 3 घंटे लगने के बाद 2000 निकले, वो भी 2000 का एक नोट... सच बोलूं तो खुशी तो मिली लेकिन वहीं बात वो नोट सिर्फ शो पीस की तरह ही था मेरे पास... कोई खुल्ले ही नहीं दे रहा था बाजार में... जैसे तैसे दिन बिते....

कुछ दिन बाद बैंक गया सुबह 6 बजे ही निकल गया... जाते हुए सोच रहा था कि अभी तो दो चार लोग होंगे अभी से ही जा के देखता हूं क्या पता मिल ही जाये... नंबर आ ही जाए और कोई विकल्प भी नहीं था मेरे पास क्योकि घर में बिल्कुल पैसे नहीं थे.. करीबन साढे ग्यारह बजे तक मेरा नंबर भी आ गया और सबसे अच्छी बात यह रही कि 24000 रुपये मिल गये... वरना लाईन में लगे लोग बता रहे थे कि तीन दिन से आ रहे है लेकिन पैसे नहीं मिल रहे... मिलते भी है तो 3000... लेकिन 24000 देखकर एक बार को तो मैं फिर सातवे आसमान में था.. बैंक वाले ने 100 के 100 नोट दिये और 2000 के सात नोट... मतलब दस हजार के लिए तो गड्डी और चौदह हजार के लिए कुछ सात नोट... क्या 2000 के नोट जारी करने से कुछ सालों में यह भ्रष्टाचार, दहेज प्रथा और नहीं बढ़ जायेगी... रामदेव की एक बात आज भी मुझे याद है, उन दिनों रामदेव योगगुरु स्वामी रामदेव थे... उनका कहना था कि भ्रष्टाचार बंद करना है तो सारे बड़े नोट बंद होने चाहिए औऱ सारी मुद्रा छोटे नोटों में होनी चाहिए। ताकि एक दो लाख में ही नोटो को बोरो में भरने की नौबत आ जाये.. लेकिन पता नहीं अब रामदेव को 2000 के नोट की बात क्यों सही लग रही है...

खैर दिन बीते आते जाते बैंको के बाहर की लाईनें देख कर बुरा लगता था.. ऑफिस आ कर जब खबरें आती थी तो और भी बुरा लगता था... कि कैसे लोग परेशान है... बात सिर्फ परेशानी की ही नहीं है बल्कि परेशानी झेलने के बाद भी लोगों को निराशा ही हाथ लग रही थी... रोते-बिलखते लोग, शादी के घरों में सन्नाटा, लाईन में लगे लोगो की मौत जैसे क्या क्या खबरे नहीं आयी... माननीय प्रधानमंत्री जी आपने सबका साथ सबका विकास की बात कही थी.. लेकिन आपके भाषण को छोड कर कहीं नहीं दिख रहा कि गरीब या मध्यम वर्ग खुश है... आप कहते हो कि गरीब चैन से सो रहा है और बेईमानों की नींद उड़ी है... तो आप ही बताइए हमारा कसूर क्या है.. क्यों लोग एटीएम में दर दर की ठोकर खा रहे है... क्यो आधी रात में उठ कर एटीएम के चक्कर काट रहे है... क्यो लंच टाइम में एटीएम जा रहे है... क्या बेइमानी की है इन लोगों ने... नींद तो इनकी भी खराब हुई... बैंको ने भी माना कि नोटों की किल्लत है... सबको साथ लेकर चलने की बात कहने वाले आप क्यों लोअर मिडिल क्लास और गरीबों को भूल गये... जो रोज काम करके देहाडी लेता है तब कुछ खाता है... बाजार में जब कैश ही नहीं है तो वो कितने दिन मुफ्त में काम करेगा... और क्यो काम करेगा... जो छात्र पढाई करने के लिए अपने राज्यों से दूसरे राज्यों में आये है उनके लिए क्यों नहीं सोचा... जो किराये पर रह रहे है और उन्हें जो घर से निकाला गया उनके लिए आपने क्यों नहीं सोचा... जिन लोगों की जान गयी उन्हें क्या मिलेगा... क्या स्वतंत्रता सेनानी कार्ड के तर्ज पर कोई कार्ड मिलेगा या कोई किसी मेडल या उपाधी से नवाजा जायेगा... हमेशा विकास की राह में इसी वर्ग को क्यों पिसना पड़ता है... काला धन का बडा हिस्सा जहां था वहां से क्या कुछ आया... कितने नेता, अभिनेता और उद्योगपती बैंको की लाईन में लगे... ना ही बदलवाने के लिए ना ही पुराने नोट को जमा करने के लिए... इक्का दूक्का नेता जरुर दिखे...

इन सब के बावजूद सबने आप की बात का समर्थन ही किया है... नोटबंदी का फैसला कैसा है इस पर सबने आपकी तारीफ ही कि है... साथ ही एक शब्द सबके मुह से निकला 'लेकिन'... इसी 'लेकिन' में लोगों के दिल की असल बात थी... फिर भी पता नहीं क्यों लोग ये बात कहने से बचते थे... शायद वो देशद्रोही नहीं बनना चाहते थे... और देश निर्माण में अपना योगदान दे रहें है... प्रधानमंत्री जी आपका यह फैसला एक दम से तो नहीं हो सकता... अपके नेतृत्व पर कतई कोई शक नहीं है... जिस तरह आपने गुजरात मॉडल पेश किया था...  आपके शालन काल में क्या मजाल एक भी खबर मीडिया में आयी हो.. लेकिन आपके हटते ही दो मुख्यमंत्री के चेहरे देख लिये... गुजरातियों का आक्रोश और गुजरात मॉडल सब दिख गया... आपने नोटबंदी काला धन सामने लाने के लिए किया था... लेकिन कितना काला धन सामने आया है आशा है कि बहुत जल्द आप इस का भी खुलासा करेंगे.. 

 

आपका

दीपक झा

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