संपादकीय
त्वरित टिप्पणी/डॉ.प्रभात ओझा...टैक्स चोरों पर एक और हमला
बैंकों में पांच सौ और एक हजार के पुराने नोट बदलवाने की अंतिम तारीख के दो दिन पहले आज बुधवार, 28 दिसंबर को केंद्र सरकार ने नोटबंदी के मामले में एक अध्यादेश को स्वीकृति दी है। इसके तहत अब पांच सौ और एक हजार के पुराने नोट रखने की सीमा तय कर दी गई है। अब एक अप्रैल से कोई व्यक्ति अपने पास 10 की संख्या तक पुराने नोट ही रख सकेगा। यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि 30 दिसंबर तक सामान्य बैंकिंग सिस्टम में पुराने नोट बदलवाने और फिर स्पष्टीकरण के साथ 31 मार्च तक रिजर्व बैंक जाने की व्यवस्था बनी रहेगी।
 आप सवाल कर सकते हैं कि अध्यादेश से पुरानी व्यवस्था में फर्क क्या आयेगा। पहली बात तो यह कि तय सीमा से अधिक नोट रखने वालों पर पचार हजार रुपये अथवा जब्त नकदी के पांच गुना तक जुर्मना लगाया जा सकेगा। नहीं लगता कि आठ नवंबर से 30 दिसंबर के मध्य कोई सामान्य व्यक्ति ऐसे 10 पुराने नोट अपने घर में रख कर निश्चिंत होगा अथवा जेब में रखकर बैंकों के चक्कर लगा रहा होगा। निश्चित ही मुश्किल ऐसे लोगों को होगी जिनके पास इस तरह के बहुत से नोट हैं और इनका हिसाब भी उनके पास नहीं है। फिर समय क्यों दिया जा रहा है? हो सकता है कि दुर्गम पहाड़ी राज्यों में ऐसे सामान्य लोग हों, जो बैंकों की अति दूर मौजूदगी अथवा मौसम और रास्तों की बाधा के कारण अपने नोट जमा नहीं कर पाये हैं।हां, हमारी सेनाओं में कार्यरत जवान और अफसर भी इस श्रेणी में मुमकिन हो सकते हैं। यहां याद आता है कि विदेशों में रहने वाले भारतीयों की तरफ से भी ऐसी मांग उठी थी कि उन्हें नोट बदलने के लिए और अधिक समय मिलना चाहिए। प्रवासी भारतवंशियों के सामने मजबूरी यह है कि बड़े भारतीय नोट उनके स्वदेश आने पर ही बदलना संभव होगा। 
सुदूर पहाड़ी प्रदेशों के निवासी, सामाओं पर तैनात देश रक्षकों और सुदूर देश के भारतवासी, ऐसे सभी लोगों को अपने नोट अपनी मेहनत की कमाई के ही होने का प्रमाण देने में कोई दिक्कत नहीं आयेगी। समय सीमा में प्रमाण सहित नोट जमा करने की छूट ऐसे ही लोगों के लिए दी गई है। दरअसल, दिक्कत उन्हें आनी है जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी काले मन वाला बताते हैं। फिर भी सच यह है कि पीएम मोदी के बयान, सरकार के फैसले और नकदी की जब्ती के साथ लोगों की परेशानी,इन सभी मुद्दों पर बहस जारी रहेगी। हमारे लोकतंत्र की खूबसूरती भी तो यही है।अभी दिक्कतें खत्म नहीं हुई हैं, अभियान का परिणाम भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं रहा है। लिहाजा देखने वालों के लिए कई तरह के परिदृश्य होंगे।
 बैंकों के बाहर खत्म नहीं होती लाइनों के अतिरिक्त कर्नाटक के व्यवसायी शेखर रेड्डी. दिल्ली के वकील रोहित टंडन, कोलकाता के मध्यस्थ व्यवसायी पारसमल लोढ़ा और तमिलनाडु के आइएएस अफसर राममोहन राव के साथ उत्तर प्रदेश की राजनेता मायावती के भाई आनन्द कुमार तक तो हैं इस परिदृश्य में। इनमें खुद बसपा जैसा राजनीतिक संगठन भी संदेह के घेरे में है। निश्ति ही पीएम और केंद्र सरकार का मकसद इस घेरे को और अधिक बढ़ाना ही है। जैसे जैसे यह घेरा बढ़ेगा, देश में मौजूद काला धन उजागर हो सकता है। आखिर काला अथवा बेनामी धन भी तो वही है, जिसका कोई हिसाब नहीं रखा गया हो। जब्त धन के मालिक इसके वैध होने का प्रमाण दे सकते हैं। हिसाब सामने आते ही, संबंधित धन पर टैक्स देना होगा। सरकार को मिला टैक्स जनहित के कार्यों पर ही खर्च होता है। नया अध्यादेश टैक्स से बचने वालों के लिए ही मुसीबत का सबब बनेगा,कम से कम यह तो तय है। 
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