संपादकीय
गिर रहा है त्यौहारों में रौनक का ग्राफ.......?
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 नई दिल्ली (शुभम कुमार गुप्ता) : प्रतिवर्ष हम हिन्दू जनमानस के लोग दुर्गा-पूजा मनाते हैं। अगर हम पूर्वजों और रामायण की बात को ध्यान दे तो पता चलता है कि भगवान को राक्षसों पर विजय पाने के लिए दुर्गा-पूजा आवश्यक हुई थी। आज विभिन्न रीति रिवाज व विभिन्न तरह से मनाये जाने वाला दुर्गा-पूजा एक औपचारिक अनुष्ठान सा रह गया है। जीवन में तो लोग प्रायः दुर्बलता की शिक्षा देते और लेते हैं। अच्छे बच्चे का भी अर्थ है कि पढ़े-लिखे, लड़ाई-झगड़े में न पड़े। किसी दुर्बल को कोई सता रहा हो, तो वहाँ से हट जाए। कोई अपमानित करे, तो चुप रहे। क्योंकि उसे पढ़-लिख कर डॉक्टर, इंजीनियर या व्यवसायी बनना है। इसलिए बदमाश से उलझने में समय नष्ट होगा। इसी प्रकार, शासक, अफसर, पत्रकार, आदि भी मुँह देख कर कार्रवाई करते हैं। दबंगों, चाहे वे अकादमिक हों या बाहुबली, से हमेशा बच कर चलते हैं। इस प्रकार, सामाजिक भीरुता का पाठ चौतरफा प्रसारित होता रहता है। यही सभी संदेश हमें विभिन्न भारतीय त्योहारों से भी मिलता है चाहे वह त्यौहार हिन्दू धर्म से सम्बन्ध रखता हो या मुस्लिम धर्म  फिर किसी भी धर्म का त्यौहार ही क्यों न हो, सभी त्यौहार हमें कोई ना कोई संदेश छोड़ जाते हैं। अगर हम आज के दुर्गा पूजा की बात करें तो हम दुर्गा-पूजा करके भी नहीं करते। इस का मर्म नहीं समझते कि दैवी अवतारों तक को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा लेनी पड़ती थी। क्योंकि दुष्टों से निपटने के लिए निर्भीक और खुला शक्ति-संधान अनिवार्य है। अपंगों, आश्रितों और साधुजनों की रक्षा के लिए वह निर्विकल्प कर्तव्य भी है। लेकिन यह कर्तव्य अब हमें नहीं सिखाया जाता। इस से हमारा व्यक्तित्व दुर्बल हुआ। जो लोग गाँधीजी की तरह शारीरिक / शस्त्र बल को ‘पशु बल’ कहकर निंदा करते हैं, उन्हें दिमागी इलाज कराना चाहिए। निर्बल व्यक्तित्व में निर्बल मन रहता है। व्यक्तित्व की आम दुर्बलता अंततः राष्ट्रीय दुर्बलता में बदल जाती है। इस का लाभ केवल हर तरह के दुष्ट उठाते हैं। आज के समय में ऐसा कहना गलत नहीं होगा की आज कुछ लोग दुर्गा पूजा, देवी देवताओं को जरिया बनाकर अपने मनोरंजन के साधन समझतें हैं, पूर्ण उम्मीद है कि मेरी यह बाते कुछ लोगों के जहन में समुचित नहीं बैठेगी। केवल चीख-चीख कर रतजगा करना देवी-पूजा नहीं है। पूजा है संकल्प लेकर चरित्र और शक्ति का संधान करना। ससम्मान जीने हेतु मृत्यु का वरण करने के लिए भी तैयार रहना। किसी तरह चमड़ी बचाकर नहीं, बल्कि दुष्टता की आँखों में आँखें डालकर जीने की रीति-नीति बनाना। यही शक्ति-पूजा है, जिसे भारत के हिन्दू भुला बैठे हैं। उन्हें भीरुता को ‘व्यवहारिकता’ समझने की चतुराई से मुक्त होना होगा। अन्यथा उन का ठोस और भावात्मक, दोनों अस्तित्व सिकुड़ता जाएगा। आज जिस तरह से देश के विभिन्न भागों में हिदुत्व के त्योहारों का आकार सिमटता जा रहा है, यह भारत के संस्कृति के लिए अच्छा नही है, आज आप अक्सर देश के बड़े शहरों में देख सकते हैं कि बहुत से लोगों को पता ही नहीं होता कि त्यौहार कब है और न ही उसकी रौनक ही दिखाई देती है। अगर हम ताजा उदाहरण देश की राष्ट्रिय राजधानी नई दिल्ली की बात करें तो यहां आपको दूर-दूर तक कोई भी दुर्गा पंडाल आपको शहर के हिस्सों में नही दिखाई देगा, और अगर कुछ एक-आक स्थानों पे दिख जाये तो इसे माँ की कृपा ही कह सकतें हैं। अब समय आ गया है कि हिन्दुत्व जनमानस को कि उन्हें अपने भारतीय संस्कृति को समझना होगा नहीं तो वह दिन दूर नहीं की पाश्चात्य सभ्यता हमारे ऊपर हावी हो जायेगी और हमारी आने वाली नई पीढ़ी के लिये यह मात्र किताब में पढ़ने के लिये इतिहास भर ही रह जायेगा। 

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