राज्यों से
इनके नाम में ही दिखती है गंगा-जमुनी तहजीब, करते हैं रामचरित मानस का पाठ
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गोरखपुर।

आज हम आपको एक ऐसे शख्‍स के बारे में बंताने जा रहे हैं जिनके नाम में ही गंगा जमुनी तहजीब का अख्‍श दिखता है। संतकबीरनगर जिले के खलीलाबाद कोतवाली क्षेत्र के मिश्रित आबादी वाले गांव में रहने वाले पंडित अब्‍दुल हमीद शास्‍त्री भगवान श्रीराम का गुणगान करते हैं। जीवन की राह में 60 का आंकड़ा पार कर चुके पंडित हमीद 15 साल की उम से ही भगवत गीता और रामायण का पाठ कर रहे हैं। लोगों में भी इन्‍हें सुनने की होड़ मची रहती है। अब तक ये यूपी के दर्जनों जिलों सहित देश के कई प्रदेशों में बतौर मानस मर्मग्य मानस पाठ और कथा कह चुके हैं।

अब्‍दुल हमीद बताते हैं, 'हम में दोनों तहजीबों के मेल से बना है, ह से हिंदू और म से मुसलमान। आज राजनीति नहीं बल्कि लुक्कानीति और कूटनीति हो रही है। राजनीति दो शब्दों से बना है, राज और नीति। राज का मतलब होता है गोपनीयता और नीति का मतलब है चलन। अब राज गायब हो गया है और नीति (साम, दाम, दंड और भेद) ही रह गई है। राज की यही नीति हमें लड़ा रही है। नीति ही अब राजनीति बन चुकी है। राजनेता अब रहे नहीं, क्यूंकि राजनीति से राज जो हट गया है। आज लोगों को चाहिए कि सभी मिलजुलकर रहें। शायद यही चीज त्रेता युग में भगवान् श्रीराम का चरित्र वर्णन, बड़े भाग्य मानुष तन पावा भी कहता है। वह यह नहीं कहता कि बड़े भाग्य हिंदू, मुसलमान, सिक्ख और ईसाई तन पावा।

हमीद जी को उनके पिता स्व. इबारत अली से खानदानी शिक्षा के रूप में हारमोनियम बजाना और गीत-गजल और कौव्वाली गाने का फन मिला। महज 15 साल की उम्र में इनके अंदर प्रभु श्रीराम के जीवन को जानने की इच्‍छा जागी। जहां कहीं भी राम चरित मानस का पाठ होता रहता था, वह पहुंच जाते थे। दो चार जगहों पर जाने के बाद इन्होंने राम चरित मानस की एक छोटी किताब खरीदी और घर लाकर पढ़ने लगे।

गांव के ब्राह्मणों, राम चरित मानस के जानकारों के साथ मिलकर हमीद ने राम चरित मानस गायन की विद्या सीखी। दोहा-सोरठा-छंद और चौपाई के बारे में इन्हें संतकबीरनगर के रहने वाले शिक्षक मित्र बीर बहादुर सिंह मास्टर ने बताया। विद्याधर दूबे को ये अपना गुरु मानते हैं। राम सुभग पाण्डेय के साथ मिलकर ये राम चरित मानस का गायन और पाठ करते हैं। एक बार इन्‍हें रामलीला में व्यास की गद्दी संभालने का भी मौका मिला।

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