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अनोखा बैंक : नोटों की जगह देता है रोटी, भरता है भूखों का पेट
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फरीदाबाद।

शहर में एक अनूठा बैंक खुला है। यहां पैसा नहीं रोटी मिलती है। इसीलिए इसका नाम है रोटी बैंक। इस बैंक को चला रही संस्था का उद्देश्य शहर के गरीब, बेसहारा, अनाथ व लाचार लोगों को रोटियां खिलाकर उनकी भूख मिटाने का है। इस अनूठे बैंक की शहर में खूब चर्चा है। भूख से जूझते गरीब व बुजुर्गों के लिए शहर का रोटी बैंक एक बड़ा सहारा बन गया है, जो उन्हें दो वक्त की रोटी मुहैया कराकर रहा है। यह रोटी बैंक एक तरफ जहां भूख मिटा रहा है, वहीं भीख मांगने वालों की संख्या भी घटा रहा है। महावीर इंटरनेशनल संस्था के सेक्रेट्री 70 वर्षीय अजीत पटवा के अनुसार कई बार जब वे रेलवे स्टेशन, बस अड्डे पर छोटे बच्चों व बुजुर्गों को खाने के लिए हाथ फैलाते देखते तो उन्हें काफी दुख होता था।

वे सोच रहे थे कि क्यों ने इन जरूरतमंदों के पेट की भूख मिटाने के लिए कुछ किया जाए। करीब दो साल से वे इस बारे में सोच रहे थे। उन्होंने अपनी संस्था के पदाधिकारियों से इस बारे में बात की। उन्होंने कहा कि मैं बुजुर्ग हा़े चुका हूं। इस कार्य के लिए युवा वालंटियर्स की जरूरत थी। ऐसे युवाओं ने इस मिशन को कामयाब बनाने के लिए पूरा सहयोग दिया। इसके चलते उन्होंने रोटी बैंक की परिकल्पना को साकार किया। उनका संकल्प है कि कोई भी भूखा न सोए। इसी को ध्यान में रखकर 26 जनवरी 2016 को अपने साथियों के साथ मिलकर रोटी बैंक की शुरुआत की। जरूरतमंदों के लिए शुरू की गई इस सेवा पर हर माह करीब एक लाख रुपए खर्च होते हैं। अजीत पटवा के अनुसार अभी रोटी बैंक के जरिए रोज 100 लोगों को खाना खिलाया जा रहा है। इनकी संख्या बढ़ भी रही है। अभी रोटी बैंक दशहरा मैदान के पास चलाया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि वे रोटी बैंक के लिए एक निर्धारित स्थान ढूंढ रहे हैं, लेकिन जब तक स्थान नहीं मिलता तब तक सात-सात दिन बदलकर अलग-अलग सार्वजनिक जगहों पर रोटी बैंक चलाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि रोटी बैंक के जरिए एक बड़े आदमी को चार रोटी और सब्जी देते हैं। बच्चे को दो रोटी और सब्जी। संस्था के चेयरमैन व रोटी बैंक के लिए काम करने वाले सुशील कुमार जैन के अनुसार जिन लोगों को रोटी बैंक से खाना दिया जाता है, उनका पूरा ब्यौरा देखा जाता है। ताकि जरूरतमंद को ही खाना मिल सके। इसके अलावा कई बार लोग प्रसाद समझकर लाइन में लग जाते हैं। उन्हें बता दिया जाता है कि यह प्रसाद नहीं है। यह उन जरूरतमंद लोगों के लिए है, जो खाना न मिलने की वजह से भूखे पेट सो रहे हैं। ऐसे में वे लोग खुद ही खाना लेने से मना कर देते हैं।

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