भोपाल
मुख्यमंत्री आवास योजना चढ़ी अफसरशाही की भेंट
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भोपाल। एक ओर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान गरीबों और बेघरों को आसावीय पट्टे और अपनी जमीन का मालिक बनाने का आश्वासन दे रहे हैं। वहीं, प्रदेश सरकार की महत्वकांक्षी मुख्यमंत्री आवास योजना बैंकों व अफसरशाही की भेंट चढ़ती जा रही है। राज्य शासन ने ग्रामीणों को आवास मुहैया कराने के लिए मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास मिशन लागू किया है, लेकिन बैंकों के असहयोग के कारण यह मिशन आगे नहीं बढ़ पा रहा है। बैंकों सहित ग्रामीण और सहकारी बैंकों के असहयोगात्मक रवैए के कारण अभियान ठप होता जा रहा है। केवल राजगढ़ जिले को छोड़कर अन्य जिलों में वर्ष 2014-15 और वर्ष 2015-16 में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, सेन्ट्रल मध्यप्रदेश ग्रामीण बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, इलाहाबाद बैंक, जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक मर्या. द्वारा तय लक्ष्य के अनुरूप न तो आवास ऋण प्रकरण स्वीकृत किए गए और न ही किसी ने इन प्रकरणों के निराकरण में दिलचस्पी दिखाई। यह स्थिति तब है, जब राज्य शासन इन बैंकों को बार-बार सहयोग करने के लिए पत्र लिख रहा है। बैंकों का तर्क है कि मिशन के तहत स्वीकृत आवासीय लोन प्रकरणों में हितग्राहियों द्वारा किस्तों का समय पर भुगतान नहीं करना है। पुराने कर्ज प्रकरणों में रिकवरी न होने को आधार बनाकर इस मिशन के हितग्राहियों को लोन देने से इंकार किया जा रहा है। अक्टूबर 2016 तक जबलपुर संभाग में आवास ऋण के करीब 15 हजार प्रकरण लंबित पड़े हैं। इन्हें मंजूरी मिलने के फिलहाल कोई आसार नहीं हैं। जिला पंचायतों को लक्ष्य तो आवंटित कर दिया, लेकिन बैंकों से लोन नहीं मिलने के कारण लक्ष्य की पूर्ति नहीं हो पाई। एक वित्तीय वर्ष में जिन प्रकरणों में लोन मंजूर नहीं हो पाते हैं, उन्हें अगले वित्तीय वर्ष में कैरी-फॉरवर्ड कर दिया जाता है। इसके चलते प्रकरणों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है। चालू वित्त वर्ष में 75 हजार मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास निर्माण का लक्ष्य तय किया गया था। इस पर विभाग के अफसरों का तर्क है कि तय लक्ष्य के अनुसार विगत छह महीने में 50 प्रतिशत प्रकरण निराकृत कर लिए गए हैं। 

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